भारत छोड़ो आन्दोलन (Quit India Movement) in Hindi

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भारत छोड़ो आंदोलन के तथ्य

  • जिसे भारत अगस्त आंदोलन या अगस्त क्रांति के नाम से भी जाना जाता है।
  • यह आधिकारिक तौर पर 9 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) द्वारा लॉन्च किया गया था।
  • कांग्रेस की विचारधारा के अनुरूप, यह एक शांतिपूर्ण अहिंसक आंदोलन था, जिसका उद्देश्य अंग्रेजों से भारत को स्वतंत्रता देने का आग्रह करना था।
  • 8 अगस्त 1942 को बंबई में कांग्रेस कार्य समिति द्वारा भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया गया था। गांधी को आंदोलन का नेता नामित किया गया था।

भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत (Starting of Quit India Movement )

भारत छोड़ो आन्दोलन (Quit India Movement) अप्रैल 1942 में क्रिप्स मिशन के असफल होने के लगभग चार महीने बाद ही स्वतंत्रता के लिए भारतीयों का तीसरा जन आन्दोलन आरम्भ हो गया| इसे भारत छोड़ो आन्दोलन के नाम से जाना गया| 8 अगस्त, 1942 को बम्बई में हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया| इस प्रस्ताव में यह घोषित किया गया था कि अब भारत में ब्रिटिश शासन की तत्काल समाप्ति भारत में स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र की स्थापना के लिए अत्यंत जरुरी हो गयी है, जिसके लिए संयुक्त राष्ट्र के देश फासीवादी जर्मनी, इटली और जापान से लड़ रहे हैं| यह प्रस्ताव भारत से ब्रिटिश शासन की समाप्ति के लिए लाया गया था| इसमें कहा गया कि एक बार स्वतंत्र होने के बाद भारत अपने सभी संसाधनों के साथ फासीवादी और साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध लड़ रहे देशों की ओर से युद्ध में शामिल हो जायेगा |

इस प्रस्ताव में देश की स्वतंत्रता के लिए अहिंसा पर आधारित जन आन्दोलन की शुरुआत को अनुमोदन प्रदान किया गया|इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद गाँधी जी ने कहा था कि एक छोटा सा मंत्र है जो मै आपको देता है| इसे आप अपने ह्रदय में अंकित कर लें और अपनी हर सांस में उसे अभिव्यक्त करें| यह मंत्र है-“करो या मरो”| अपने इस प्रयास में हम या तो स्वतंत्रता प्राप्त करेंगें या फिर जान दे देंगे| भारत छोड़ो आन्दोलन (Quit India Movement) के दौरान ‘भारत छोड़ो’ और ‘करो या मरो’ भारतीय लोगों का नारा बन गया |

9 अगस्त 1942 की सुबह ही कांग्रेस के अधिकांश नेता गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें देश के अलग अलग भागों में जेल में डाल दिया गया साथ ही कांग्रेस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया| देश के प्रत्येक भाग में हड़तालों और प्रदर्शनों का आयोजन किया गया| सरकार द्वारा पूरे देश में गोलीबारी, लाठीचार्ज और गिरफ्तारियां की गयीं| लोगों का गुस्सा भी हिंसक गतिविधियों में बदल गया था| लोगों ने सरकारी संपत्तियों पर हमले किये, रेलवे पटरियों को उखाड़ दिया और डाक व तार व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दिया| अनेक स्थानों पर पुलिस और जनता के बीच संघर्ष भी हुए| सरकार ने आन्दोलन से सम्बंधित समाचारों के प्रकाशित होने पर रोक लगा दी| अनेक समाचारपत्रों ने इन प्रतिबंधों को मानने की बजाय स्वयं बंद करना ही बेहतर समझा |

1942 के अंत तक लगभग 60,000 लोगों को जेल में डाल दिया गया और कई हजार मारे गए|मारे गए लोगों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे| बंगाल के तामलुक में 73 वर्षीय मतंगिनी हाजरा, असम के गोहपुर में 13 वर्षीय कनकलता बरुआ, बिहार के पटना में सात युवा छात्र व सैकड़ों अन्य प्रदर्शन में भाग लेने के दौरान गोली लगने से मारे गए| देश के कई भाग जैसे, उत्तर प्रदेश में बलिया, बंगाल में तामलूक, महाराष्ट्र में सतारा, कर्नाटक में धारवाड़ और उड़ीसा में तलचर व बालासोर, ब्रिटिश शासन से मुक्त हो गए और वहां के लोगों ने स्वयं की सरकार का गठन किया| जय प्रकाश नारायण, अरुणा आसफ अली, एस.एम.जोशी.राम मनोहर लोहिया और कई अन्य नेताओं ने लगभग पूरे युद्ध काल के दौरान क्रांतिकारी गतिविधियों का आयोजन किया |

युद्ध के साल लोगों के लिए भयानक संघर्ष के दिन थे| ब्रिटिश सेना और पुलिस के दमन के कारण पैदा गरीबी के अलावा बंगाल में गंभीर अकाल पड़ा जिसमे लगभग तीस लाख लोग मरे गए| सरकार ने भूख से मर रहे लोगों को राहत पहुँचाने में बहुत कम रूचि दिखाई |

आंदोलन का प्रभाव (Impact of the Quit India Movement)

हालाँकि गाँधी जी के इस आंदोलन का उस समय तत्काल स्वतंत्रता प्राप्त करने के मामले में कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ा, लेकिन इसने भारत की सन 1947 की स्वतंत्रता में निम्न प्रभाव पड़ा-

  • इससे कांग्रेस पार्टी के साथ ही साथ लोगों में एकजुट होने की भावना पैदा हो गई.
    इससे अंग्रेजों के दिमाग में एक चीज आ चुकी थी कि पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए अब भारतीय उनकी अपेक्षा से अधिक विद्रोह करने के लिए तैयार हैं.
  • अंग्रेजों को यह भी समझ आ गया था कि भारत को अब ग्लोबल नेताओं का भी समर्थन प्राप्त हैं क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रेंक्लिन डी रूज़वेल्ट ने ब्रिटिश प्रशासन से भारतीय की कुछ मांगों को पूरा करने के लिए आग्रह किया था.
  • स्वतंत्रता पर आंदोलन का एक बड़ा प्रभाव यह भी पड़ा कि विभिन्न हिंसक गतिविधियों के चलते कई संपत्तियों का नुकसान हो गया था. अंग्रेजों को लगा कि यदि भारत पर लंबे समय तक शासन करना है तो भारत का पुनर्निर्माण करना होगा.
  • दूसरी ओर द्वितीय विश्व युद्ध से ब्रिटिशों का काफी मौद्रिक नुकसान भी हुआ था. जिससे उनके पास इतना धन नहीं था कि वे भारत का पुनर्निर्माण कर सकें. और अंग्रेजों को यह एहसास हो गया कि अब भारत में शासन करना संभव नहीं है. सन 1945 में जब युद्ध समाप्त हो गया तब उनके दिमाग में यह बात थी कि शांति और शालीनता के साथ भारत को छोड़ देना ही उनके लिए सही होगा. हालाँकि अंग्रेजों को यह लग रहा था कि भारत को इस हाल में छोड़ देंगे तो भारत पर कोई और देश राज कर सकता है. किन्तु ऐसा नहीं हुआ.

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